श्री कृष्ण जी
🌺🌻 श्रीकृष्ण जी 🌻🌺
👉जन्माष्टमी को भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में जन्म लिया। इसलिये भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।]
👉प्रत्येक त्योहार में लोकवेद की अहम भूमिका रही है।
लोकवेद के अनुसार जन्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है।
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👉🌹श्री कृष्ण द्वारा की गई लीलाएं 🌹👈
👉श्री कृष्ण ने अपने जीवन में अनेकों लीलाएं की वो 16 कलाओं के भगवान है,उनके मामा कंस द्वारा उनको मारने के अनेक प्रयत्न किए गए
जैसे- पूतना के द्वारा उन्हें जहरीला दूध पिलाना,कागासुर के द्वारा मारने की कोशिश ओर ऐसी ही अनेक प्रयत्न किय गए जिनमें वो सफल नहीं हुआ।
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दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोधी के पीर शेखतखि द्वारा कबीर परमात्मा को मारने के 52 बार प्रयास किय गए
जैसे - उन्हें खूनी हाथी के सामने डालना, उबलते हुए सरसो के तेल में डालना, उनके गले में जहरीला सांप डालना, जहरीले बिच्छू फेंकना, गरम लोहे को पिघलाकर डालना, अष्टधातु से मारने का प्रयास करना, कुए में डालना ,पानी में डुबोकर मारना ऐसे ही बहुत से प्रयास प्रयास किए गए जिनमें शेख तखी सफल नहीं हुआ।
कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन दोंनो निष्फल है, पूछो वेद पुराण।।
कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरू कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरू आगे आधीन।।
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श्रीमद्भगवत् गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में व्रत/उपवास करने को मना किया गया है कि हे अर्जुन! यह योग (भक्ति) न तो अधिक खाने वाले की और न ही बिल्कुल न खाने वाले की अर्थात् यह भक्ति न ही व्रत रखने वाले, न अधिक सोने वाले की तथा न अधिक जागने वाले की सफल होती है। इस श्लोक में व्रत रखना पूर्ण रुप से मना है। जो ऐसा कर रहे हैं वह शास्त्र विरुद्ध साधना कर रहे हैं।
भगवान कृष्ण द्वारा मोरध्वज के बेटे ताम्रध्वज को जीवित करना, लेकिन वो अपनी बहन सुभद्रा के बेटे अभिमन्यु को जीवित नहीं कर पाए।
उसी प्रकार कबीर परमात्मा द्वारा शेख तख़ी की बेटी कमाली को कबर खुदवाकर जिंदा करना ।ओर नदी में बहकर अाई एक लड़के की लाश को जीवित किया तथा उसका नाम कमाल निकाला।
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श्री कृष्ण 16कलाओं के धनी है, वहीं कबीर परमात्मा सहस्त्र कलाओं के धनी है।
श्री कृष्ण जन्म मरन के चक्र को नहीं काट सकते तभी उनको अपने राम जन्म में किए ग क्रम को कृष्ण अवतार में भुगतना पड़ा था, उन्होंने राम अवतार में सुग्रीव के भाई बाली को पेड़ के पीछे छिपकर वार किया था जिससे उसकी मृत्यु हुई थी। जो उन्हें कृष्ण जन्म में भुगतना पड़ा क्युकी उनको एक शिकारी के द्वारा विषेले तीर से वार किया गया ओर उस तीर से उनकी मृत्यु हुई ।
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इस प्रकार श्री कृष्ण प्रारब्ध के कर्मो को नहीं काट सकते।
पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब का जन्म माता के ग्रभ से नहीं हुआ है वो लहरतारा तालाब में एक कमल के फूल प्र प्रकट हुए तथा वहां एक निस्तान दंपति नीरू ओर निमा को मिले ओर उनके द्वारा उनका पालन पोषण किया गया
पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की मृत्यु नहीं होती वो सशरीर आते है ओर सशरीर ही सतलोक जाते है, वो हमारे प्रारब्ध के कर्मो को काट सकते है तथा हमें जन्म मरण के इस चक्र से मुक्ति दिलाकर सम्पूर्ण मोक्ष दिलाते है।
कबीर चारभुजा के भजन में भूली परे सब संत ।
कबीरा सुमिरै तासु को जाके भुजा अनंत ।।
श्री कृष्ण जी चतुर्भुजी भगवान थे तो वह परमात्मा कौन है जिसकी अनंत भुजाएं हैं
गीता बोलने वाला काल अर्जुन को पूर्ण परमात्मा की शरण में जाने को कह रहा है।
पवित्र गीता जी अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि हे अर्जुन! तू सर्व भाव से उस पूर्ण परमात्मा की शरण में चला जा। जिसकी कृपा से ही तू परम शान्ति तथा सनातन परम धाम(सतलोक) को प्राप्त होगा। पवित्र गीता जी को श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके ब्रह्म(काल) ने बोला, फिर कई वर्षों उपरांत पवित्र गीता जी तथा पवित्र चारों वेदों को महर्षि व्यास जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके स्वयं ब्रह्म(क्षर पुरुष) द्वारा लिपिबद्ध भी स्वयं ही किए हैं। इनमें परमात्मा कैसा है, कैसे उसकी भक्ति करनी है तथा क्या उपलब्धि होगी, सतज्ञान का पूर्ण वर्णन है। परन्तु पूजा की विधि केवल ब्रह्म(क्षर पुरुष) अर्थात् ज्योति निरंजन-काल तक की ही है।
गीता बोलने वाला काल कहता है की ‘‘वासुदेव’’ ही सब कुछ है ( वासुदेव कृष्ण नहीं पूर्ण ब्रह्म परमात्मा कबीर है ) यही सबका सृजनहार है। यही पापनाशक, पूर्ण मोक्षदायक, यही पूजा के योग्य है। यही (वासुदेव ही) कुल का मालिक परम अक्षर ब्रह्म है। केवल इसी की भक्ति करो, अन्य की नहीं। जहाँ जाने के पश्चात् साधक लौटकर संसार में नहीं आता, जिस परमेश्वर से संसार रुपी वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है अर्थात् जिस परमेश्वर ने सर्व की रचना की है, उसी की पूजा करो।
वह परमेश्वर पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब हैं जो तत्वदर्शी संत की भूमिका में संत रामपाल जी रूप में धरती पर अवतरित हैं। जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव के दादा और काल के पिता और हम सब के भी जनक हैं।
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